लोड कैलकुलेशन में फ़ैक्टर क्यों लगते हैं
बिल्डिंग का इलेक्ट्रिकल डिज़ाइन लोड सूची से शुरू होता है — कितनी लाइटें, कितने एसी, कितनी मोटरें। अगर हर उपकरण को एक साथ चलने वाला मान लिया जाए, तो सर्विस केबल, मेन फ़ीडर और ट्रांसफ़ॉर्मर सब ज़रूरत से बड़े चुनने पड़ते हैं। यह सिर्फ़ पैसे की बर्बादी नहीं — ओवरसाइज़ उपकरणों की कार्यवाही और रखरखाव भी भारी पड़ता है।
असल में हर उपकरण पूरे समय नहीं चलता, और सब एक साथ चरम पर नहीं होते। इसी सच्चाई को मापने के लिए दो फ़ैक्टर इस्तेमाल होते हैं — डिमांड फ़ैक्टर और डायवर्सिटी फ़ैक्टर। दोनों मानकों और अनुभवी प्रैक्टिस का हिस्सा हैं और सर्विस कनेक्शन, मेन फ़ीडर और ट्रांसफ़ॉर्मर का आकार तय करते हैं।
यह लेख दोनों फ़ैक्टर को सीधी भाषा में समझाता है — क्या होते हैं, कैसे निकाले जाते हैं, और अपने प्रोजेक्ट में कहाँ लगते हैं। आख़िर में एक पूरा उदाहरण भी है, जिसे दोहराकर आप अपने हिसाब की जाँच कर सकते हैं।
डिमांड फ़ैक्टर क्या है
डिमांड फ़ैक्टर बताता है कि कुल जोड़ी गई क्षमता में से असल में चरम पर कितना हिस्सा काम पर लगता है। इसका सीधा सूत्र है: डिमांड फ़ैक्टर = अधिकतम माँग ÷ कुल जोड़ी गई क्षमता। यह हमेशा 1 या उससे कम होता है, क्योंकि चरम माँग कभी भी कुल क्षमता से ज़्यादा नहीं होती।
उदाहरण के लिए, एक दफ़्तर में दिन के कुछ घंटों में ही एसी, प्रिंटर और सर्वर साथ चलते हैं; शाम के समय लोड गिर जाता है। अगर जोड़ी गई क्षमता 40 kW है और पूरे दिन का अधिकतम लोड 28 kW दिखा, तो डिमांड फ़ैक्टर 28 ÷ 40 = 0.7 बैठता है। यही 0.7 सर्विस केबल और मेन स्विच का आकार तय करने में इस्तेमाल होता है।
ध्यान दें: डिमांड फ़ैक्टर एक बिल्डिंग या एक हिस्से की अपनी माँग दिखाता है। इसे लोड प्रोफ़ाइल देखकर या मानकों में दी गई तालिका से लिया जाता है; अंदाज़े से लगाया गया मान पूरे हिसाब को बिगाड़ देता है।
एक और बात: डिमांड फ़ैक्टर स्थिर नहीं रहता — मौसम और समय के साथ बदलता है। गर्मी में एसी का लोड चढ़ता है, शाम को लाइटिंग का। इसलिए प्रोफ़ाइल वाली जगहों — ऑफ़िस, रिटेल — में चरम दिन या चरम घंटे का लोड देखकर फ़ैक्टर तय होता है, पूरे साल के औसत से नहीं।
डायवर्सिटी फ़ैक्टर क्या है
डायवर्सिटी फ़ैक्टर अलग बात बताता है — कई हिस्सों की अपनी-अपनी चरम माँग कभी एक साथ नहीं आती। इसका सूत्र है: डायवर्सिटी फ़ैक्टर = सभी हिस्सों की चरम माँगों का योग ÷ सिस्टम की अधिकतम समवर्ती माँग। यह 1 या उससे ज़्यादा होता है — जितना बड़ा यह मान, उतना ज़्यादा फ़ायदा एक साथ न चलने में।
मान लीजिए छह फ़्लैट हैं और हर फ़्लैट की अपनी चरम माँग 5 kW है। सभी फ़्लैटों की चरम माँगों का योग 30 kW बनता है, लेकिन शाम के चरम घंटे में असल में 20 kW ही एक साथ दिखता है। डायवर्सिटी फ़ैक्टर = 30 ÷ 20 = 1.5। इसी वजह से बिल्डिंग का ट्रांसफ़ॉर्मर 30 kW के बजाय 20 kW की ज़रूरत के हिसाब से चुना जाता है।
बोलचाल में लोग दोनों को एक ही नाम से पुकार लेते हैं, पर दिशा उल्टी है: डिमांड फ़ैक्टर घटता है (1 से कम) और डायवर्सिटी फ़ैक्टर बढ़ता है (1 से ज़्यादा)। यह फ़र्क़ समझ लेने पर तालिका याद रखने की ज़रूरत नहीं रहती।
दोनों फ़ैक्टर में फ़र्क़ एक नज़र में
| पहलू | डिमांड फ़ैक्टर | डायवर्सिटी फ़ैक्टर |
|---|---|---|
| क्या बताता है | चरम पर कितनी क्षमता सच में काम आती है | अलग हिस्सों की चरम माँगें कितनी साथ आती हैं |
| सूत्र | अधिकतम माँग ÷ कुल जोड़ी गई क्षमता | चरम माँगों का योग ÷ समवर्ती अधिकतम माँग |
| आम मान | 1 या उससे कम | 1 या उससे ज़्यादा |
| कहाँ लगता है | सर्विस कनेक्शन, मेन फ़ीडर | ट्रांसफ़ॉर्मर, बसबार, मेन स्विच |
दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। डिमांड फ़ैक्टर एक इकाई के भीतर की सच्चाई दिखाता है, डायवर्सिटी फ़ैक्टर कई इकाइयों के बीच की। अच्छा डिज़ाइन दोनों को साथ जोड़कर देखता है, क्योंकि एक की ग़लती दूसरे का पूरा हिसाब बिगाड़ देती है।
एक उदाहरण से पूरा हिसाब
छोटे कमर्शियल बिल्डिंग का उदाहरण लीजिए। जोड़ी गई क्षमता 60 kW है: लाइटिंग 12 kW, एसी 30 kW, सॉकेट और अन्य उपकरण 18 kW।
चरण 1 — हिस्सों का डिमांड फ़ैक्टर
लाइटिंग का डिमांड फ़ैक्टर 0.9, एसी का 0.8 और सॉकेट का 0.6 मान लीजिए। इसी चरण पर हिस्सों की माँग निकलती है: 10.8 kW + 24 kW + 10.8 kW = 45.6 kW।
चरण 2 — डायवर्सिटी फ़ैक्टर
तीनों हिस्सों की माँग 1.2 के डायवर्सिटी फ़ैक्टर से गुज़ारिए: 45.6 ÷ 1.2 = 38 kW। यही बिल्डिंग की असली चरम माँग है, और 38 kW पर करंट निकालकर सर्विस केबल व मेन बसबार चुना जाता है।
चरण 3 — करंट तक पहुँचना
मान लीजिए यह बिल्डिंग तीन-फ़ेज़ सप्लाई पर है और पावर फ़ैक्टर 0.9 है। 38 kW पर करंट I = 38000 ÷ (1.732 × 415 × 0.9) ≈ 58 A बैठता है। यही करंट सर्विस केबल, मेन स्विच और बसबार का आधार बनता है — देखिए, दोनों फ़ैक्टर लगने के बाद 60 kW की जोड़ी गई क्षमता का हिसाब कितना छोटा रह जाता है।
यह उदाहरण सिर्फ़ तरीक़ा दिखाता है; असली प्रोजेक्ट में फ़ैक्टर के मान उस भवन के प्रकार और लागू मानक के हिसाब से तय होते हैं। तय मानों को अंदाज़े से लगाने के बजाय प्रोफ़ाइल और मानक-तालिका देखने की आदत डालिए।
अपने प्रोजेक्ट में ये फ़ैक्टर कैसे लगाएँ
- सबसे पहले पूरी बिल्डिंग या हिस्से की जोड़ी गई क्षमता की लिस्ट बनाइए — हर सर्किट का लोड मॉडल में दर्ज कीजिए।
- हिस्सों — लाइटिंग, पावर, एसी — के लिए अलग-अलग डिमांड फ़ैक्टर लगाइए; एक ही मान पूरी बिल्डिंग पर मत थोपिए।
- सर्विस कनेक्शन और मेन फ़ीडर का आकार डायवर्सिटी लगने के बाद बची माँग पर तय कीजिए।
- हाथ से निकाले गए हिसाब की जाँच ऑनलाइन टूल से दोबारा कर लीजिए — एक बार अपने हिसाब से, एक बार सॉफ़्टवेयर से।
फ़ैक्टरों का असली फ़ायदा तब दिखता है जब कैलकुलेशन मॉडल से जुड़ा हो। GorkyCAD में एक ही मॉडल से वन-लाइन डायग्राम, पैनल और केबल शेड्यूल बनते हैं, इसलिए लोड बदलने पर पूरा हिसाब साथ बदलता है — फ़ैक्टर कहीं दोबारा जोड़ने की ज़रूरत नहीं रहती। फ़्री प्लान में तीन प्रोजेक्ट तक बिना कार्ड के बनते हैं; Pro €40 प्रति माह है, जिसमें प्रोजेक्ट की गिनती पर रोक नहीं और सदस्यता कभी भी रोकी जा सकती है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
डिमांड फ़ैक्टर हमेशा एक से कम क्यों होता है?
यह कुल क्षमता में से सच में लगने वाली माँग दिखाता है; चरम माँग कभी जोड़ी गई क्षमता से ज़्यादा नहीं होती, इसलिए यह 1 या उससे कम ही रहता है।
डायवर्सिटी फ़ैक्टर का बड़ा मान किसका संकेत है?
बड़ा मान बताता है कि हिस्सों की चरम माँगें एक साथ नहीं मिलतीं, यानी सिस्टम का आकार छोटा रखा जा सकता है।
क्या ये फ़ैक्टर केबल साइज़िंग पर सीधे लगते हैं?
किसी सर्किट की केबल का फ़ैसला उस सर्किट के लोड और मानक डीरेटिंग पर होता है; डिमांड और डायवर्सिटी फ़ैक्टर मेन सप्लाई तथा फ़ीडर स्तर पर लगते हैं।
फ़ैक्टर के मान कहाँ से लें?
लागू मानक की तालिका या भवन के प्रकार के अनुभव-आधारित मान लीजिए और उन्हें प्रोजेक्ट की टिप्पणियों में दर्ज रखिए, ताकि जाँच में हिसाब साफ़ दिखे।